बुद्धिजन्म या भगवत गीता कौन सा रास्ता सही है
जब भी इंसान अपने जीवन को ध्यान से देखता है तो सबसे पहले उसे एक बात साफ दिखती है जीवन मे संघर्ष है बेचैनी है असंतोष है कोई धन से परेशान है कोई रिश्तों से, कोई पहचान से तो कोई मृत्यु के भय से। यही वह पॉइंट है जहाँ सोच, विचार जन्म लेता है। भारत की भूमि पर ऐसे ही प्रश्नो से दो महान विचार परंपराएं उभरी- एक है गौतम बुद्ध द्वारा दिया गया बुद्धिजम, और दूसरी है भागवत गीता मे प्रस्तुत जीवन- दर्शन। आज भी यह प्रश्न उतना ही जीवित है की इनमे से कौन सा मार्ग सही है या फिर दोनों मे से किसी एक को चुनना जरूरी भी है या नही।
सबसे पहले बुद्धिजम को समझते है बुद्धिजम किसी धर्म की तरह नही, बल्कि एक समस्या के समाधान की तरह शुरू होता है गौतम बुद्ध ने जीवन को बहुत सीधे तरीके से देखा। उन्होंने कहा की जीवन मे दुःख है यह कोई दार्शनिक कल्पना नही, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव है बुढ़ापा दुख है, बीमारी दुख है और मृत्यु दुख है यहाँ बुद्ध किसी ईश्वर को दोष नही देते, न ही किसी पाप पुण्य के हिसाब की बात करते है वे केवल यह पूछते है की जब दुख है तो उसका कारण क्या है बुद्ध कहते है की दुख का कारण इच्छा है पकड़ है चाह है हम चीजो को स्थायी मान लेते है जबकि वे अस्थायी है हम रिस्तो, शरीर, पद, धन सबको मेरा मान लेते है और जब वे छिनते है तो दुख पैदा होता है बुद्धिजम का पुरा ढांचा इसी समझ पर खड़ा है की यदि हम वास्तविकता को जैसा है वैसा देख ले तो खुद अपने आप कम होने लगता है इसीलिए बुद्ध चार आर्य सत्य और आठ अंग मार्ग की बात करते है यह मार्ग कोई पूजा पाठ नही है बल्कि जिन की एक शैली है सही सोच, सही वाणी, सही कर्म सही आजीविका ये सब बुद्धजम मे उतने ही महत्वपूर्ण है जितना ध्यान। बुद्धजम व्यक्ति को भीतर की यात्रा पर ले जाता है यहाँ ईश्वर की खोज नही है बल्कि चेतना की समझ है निर्वान का अर्थ किसी वर्ग मे जाना नही, बल्कि इच्छा और अज्ञान से मुक्त होकर शांति पाना है
