बहुत लोग सोचते है की दलित मतलब एक ही जाती। लेकिन असमीयत उससे बिल्कुल अलग है दलित एक श्रेणि है जिसके अंदर कई अलग-अलग जाती आती है और हर जाती का अपना इतिहास और पहचान होती है उदाहरण के तौर पे उत्तर भारत मे जाटव , बाल्मीकि, चमार, पासी दुसाध, नट, भंगी जैसे नाम मिलते है जबकि महाराष्ट्र मे महार, मांग, मातंग जैसे जातियाँ ज्यादा दिखती है सभी को संबिधान मे एक ही SC के रूप मे दर्ज किया जाता है लेकिन जमीन पर समाज खुद को एक जैसा नही मानता। हर उप जाती के अपने रीति रिवाज, खाने का तरीका , देवी देवता, पेशा और सामाजिक दर्जा होता है इसीलिए जब हम दलित समाज कहते है तो इसका मतलब एक ही पहचान नही बल्कि कई अलग पहचाने जो एक छतरी के नीचे आती है यही विविधता आगे चलकर रिश्तों, शादी, और सामाजिक दर्जे मे टकराव पैदा करती है अब मुख्य बिंदु समझते है जब एक दलित उपजाति का लड़का या लड़की किसी दूसरी दलित उप जाती मे शादी करता है तो इसे दलितों के अंदर अंतर जातीय विवाह कहा जाता है ये दलित सवर्ण शादी नही है बल्कि एक ऐसा रिश्ता है जहाँ दोनो लोग दलित है लेकिन उनकी जाती अलग है बाहर देखने पर ये साधारण लगता है अरे दोनों दलित है तो दिक्कत क्या है । लेकिन असली समस्या यही शुरू होती है क्यो की समाज के अंदर जो जातिगत रैंकिंग बनी हुई है वो इस शादी को आसानी से स्वीकार नही करती। इसे लोग सिर्फ प्रेम या व्यक्तिगत निर्णय नही मानते बल्कि अपनी जाती की इज्जत, खून परंपरा या रिवाज से जोड़ देते है इसीलिए शादी का अर्थ सिर्फ दो लोगो का मिलन नही रह जाता बल्कि दो जातियों के बीच की दीवार टूटने जैसा हो जाता है
भारत मे शादी को अक्सर परिवार और समाज का फैसला माना जाता है ना की सिर्फ दो लोगों का चुनाव। यही सोच दलित समाज मे भी लागू होती है जब कोई लड़का या लड़की अपनी उप जाती से बाहर शादी करना चाहता है तो परिवार कहता है हमारी जाती उनसे बेहतर है हम उनके यहाँ शादी नही करेंगे। लोग क्या बोलेंगे। कई बार पंचायते भी रोक लगाती है रिस्तेदार ताना मारते है और प्रेम करने वाले लड़का लड़की को घर छोड़ना पड़ता है कुछ जगहो पर धमकी मारपीट, यहाँ तक की हत्त्या या आत्म ह्त्या जैसी घटनाएँ भी हो जाती है यानी समस्या ये नही की दोनों दलित है समस्या ये है की दलित समाज खुद भीतर से बटा हुआ है इस बटवारे को बाहर कोई नही देखता लेकिन अंदर के लोग इसे गहराई से महसूस करते है दलित समाज के अंदर भी एक छुपा हुआ स्तर है यानी कौन सी उप जाती उची है और कौन नीची। यह पुरानी पहचान, पेशे, आर्थिक स्थिति और सामाजिक शक्ति पर आधारित है उदाहरण के तौर पर सफाई या शव संस्कार जैसे कामो से जुड़ी जातियों को अक्सर नीचा माना जाता है जबकि खेती लडाई या प्रशासन से जुड़ी जातियो को उचा समझा जाता है कई जगह जिन जातियो के पास जमीन या शिक्षा ज्यादा है वो खुद को समाज मे ऊपर मानती है यह सोच कही ना कही सवर्ण जातिवाद की ही नकल है बस फर्क इतना है की अत्याचार करने वाला भी दलित है और झेलने वाला भी दलित है यही भेदभाव शादी, रिश्ते, दोस्ती और राजनीतिक एकता पर गहरा असर डालता है
जब कोई दलित उप जातियो के बीच शादी करना चाहता है तो बात सिर्फ दो लोगो की पसंद तक सीमित नही रहती। यह समाज के अंदर पहचान और सत्ता से जुड़ जाती है कई उप जातियाँ अपने आप को उची मानती हैं और दूसरी उप जातियाँ को अपने बराबर नही समझती। इसीलिए जब लड़का या लड़की वहा शादी करता है तो उन्हे लगता है की उनकी जाती का लेवल गिर जायेगा। कई घरों मे लड़कियों की शादी नीचे समझी जाने वाली जाती मे करने पर ताना दिया जाता है अपनी बेटी को नीचे भेज दिया। मान लीजिये एक जटाव लड़का और बाल्मीकि लड़की एक दूसरे से शादी करना चाहते है दोनों SC कटेगरी मे आते हैं कानूनी रूप से बराबर है पर समाज मे नही। लड़की के परिवार वाले कहेंगे। हम सफाई करने वाली जाती मे शादी नही करेंगे। लड़के वाले कहेंगे। हमारी जाती ज्यादा पढ़ी लिखी और आगे है इसी तरह महाराष्ट्र मे कई बार महार और मतंग जातियो के बीच भी शादी पर विरोध देखा गया है बिहार मे दुसाध और पासी समुदाय के बीच संघर्ष अक्सर सुनाई देता है ये उदाहरण दिखाते हैं की दलित आंदोलन एक नही है वह अंदर से बिखरा हुआ है जब अंदर ही दीवारे हो तो बाहर के अत्याचार के खिलाफ लडाई कमजोर हो जाती है
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