आंबेडकर प्रधानमंत्री होते तो हमारा भारत आज कैसा होता।

 

 

अक्सर हम सोचते है की अगर आज़ादी के बाद डॉ. भीम राव आंबेडकर देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो आज का भारत कैसा दिखता? यह सवाल सिर्फ कल्पना नही है क्योंकि आंबेडकर ने भारत की हर समस्या चाहे वो खेती हो, पैसा हो या समाज उस पर बहुत विस्तार से लिखा है। उनकी किताबे जैसे अनिहिलेशन आफ कास्ट, द प्रॉब्लम आफ द रूपी और स्टेट्स एंड मैनोरिटीज हमे बताती है की उनके पास देश को चलाने का एक पुरा रोडमैप था। अगर वे प्रधानमंत्री होते, तो भारत की राजनीतिक और आम आदमी की जिंदगी आज से काफी अलग होती। उनके फैसलो का सबसे बड़ा असर हमारे आर्थिक ढाँचे पर पड़ता। 1947 मे उन्होंने एक ज्ञापन तैयार किया था जिसमें उन्होंने स्टेट समाजवाद state Socialism की बात की थी इसका सीधा मतलब यह था की देश के बड़े उद्योग और सारी खेती की जमीन सरकार की होती। वे निजी कंपनियों के बजाय सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सिस्टम पर भरोशा करते थे ताकि मुनाफा चंद लोगो की जेब मे न जाय।

 

प्रधानमंत्री के तौर पे आंबेडकर का सबसे क्रांतिकारी कदम होता खेती का राष्ट्रीय करण । आज हम देखते है की किसानो के पास छोटे छोटे खेत है और वे कर्ज मे डूबे रहते है आंबेडकर का मानना था की जब तक खेती निजी हाथो मे है किसान कभी तरक्की नही कर पायेगा। उनके राज मे सरकार सारी जमीन अपने पास लेती और फिर गाओ के लोगो को बिना किसी भेदभाव के खेती के लिए देती। इसमें कोई जमींदार नही होता, कोई छोटा -बड़ा किसान नही होता। सरकार खुद अच्छे बीज, मशीनें और खाद देती। इससे गाव के दलित और पिछड़ों को भी जमीन पर बराबर का हक मिलता, जो सदियों से उनसे छिना गया था आज जो हम गाओ मे गरीबी और प्लायन देखते है वह आंबेडकर के इस मॉडल से काफी हद तक खत्म हो चुका होता क्योंकि खेती को वे एक सरकारी उद्योग की तरह चलाते। शिक्षा और सेहत के मामले मे आंबेडकर का मानना था की ये चीजे मुफ्त और सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। अगर वे प्रधानमंत्री होते, तो आज जो हम गली गली मे महंगे प्राइवेट स्कूल और अस्पताल देखते है वैसी स्थिति नही होती। वे बजट का सबसे बड़ा हिस्सा पढाई पे खर्च करते। उनके भाषणो से पता चलता है की वे प्राइमरी स्कूल से ज्यादा कॉलेज और तकनीकी शिक्षा पर जोर देते थे ताकि देश मे बड़े बड़े वैज्ञानिक और अफसर तैयार हो। वे चाहते थे की गरीब से गरीब बच्चा भी उसी स्कूल मे पढ़े जहाँ अमीर का बच्चा पढ़ता है उनके लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ डिग्री नाही, बल्कि इंसान को अंधविश्वास से बाहर निकालना था वे स्कूलों मे तर्क और विज्ञान की पढाई को अनिवार्य करते ताकि समाज से जातिवाद जैसी कुरीतिया जड़ से खत्म हो सके।

 

जातिवाद के मुद्दे पे आंबेडकर का रुख सिर्फ भाषणो तक सीमित नही होता। वे प्रधानमंत्री के तौर पे ऐसे कानून लाते जो समाज की जडो को बदल देते। उन्होंने अपनी किताब अनिहिलेशन ऑफ कास्ट मे लिखा है की अंतरजातीय विवाह ही जाती को खत्म करने का असली तरीका है वे शायद ऐसे विवाह करने वालो को सरकारी नौकरियों मे प्राथमिकता देते। एक और बड़ी बात, वे मंदीर के पुजारियों के लिए एक सिविल सर्विस परीक्षा जैसा सिस्टम चाहते थे यानी कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाती का हो, अगर वह शास्त्र जानता है और परीक्षा पास करता है तो ही पुजारी बन सकता था इससे धर्म पर किसी एक खास वर्ग का कब्जा खत्म हो जाता। आरक्षण को वे सिर्फ नौकरी का जरिया नही बल्कि प्रशासन मे बराबरी का हिस्सा मानते थे और इसे निजी क्षेत्र मे भी लागू करने की कोशिश करते। मजदूरों के हक के लिए आंबेडकर ने जो काम किया, वह आज भी हमारे कानून की बुनियाद है वे जब वायसराय की काउंसिल मे थे तभी उन्होंने काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किये थे अगर वे प्रधानमंत्री बनते, तो भारत मे लेबर ला दुनिया मे सबसे मजबूत होते। वे हर मजदूर के लिए न्यूनतम वेतन, विमा और पेंशन की गारंटी देते। आज जो हम देखते है की कान्ट्रैकट  पर लोगो को रखा जाता है और फिर निकाल दिया जाता है आंबेडकर के राज मे यह मुम किन नही होता। वे चाहते थे की कंपनी के मुनाफे मे मजदूरों का भी हिस्सा हो। उनके लिए मजदूर सिर्फ एक मशीन नही, बल्कि देश बनाने वाला सबसे जरूरी इंसान था। इससे देश मे अमीरी और गरीबी की खाई आज जितनी गहरी नही होती।

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