I Researched When the Caste System Began and Who Was Behind It | जातिव्यवस्था

 

Cast system 12 March 2026 12: 20am writtee: sumant yadav


भारत मे जाती व्यवस्था आज भी समाज की एक बड़ी सच्चाई है हम अक्सर सुनते है की कोई ब्राह्मण है कोई क्षत्रिय है कोई वैश्य है और कोई शुद्र है इसके अलावा हजारो अलग अलग जातीय भी है जैसे यादव, कुर्मी, जाट, जाटव, बनिया, नाई, लोहार कुम्हार और कई दूसरी जातियाँ. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है की आखिर यह जाती व्यवस्था शुरू कब हुई और किसने इसे बनाया. क्या यह हमेशा से भारत मे थी या फिर किसी समय इसे समाज मे लागू किया गया. इतिहास कार बताते है की भारत मे शुरू मे ऐसा कठोर जाती सिस्टम नही था जैसा आज हमें दिखाई देता है बहुत पुराने समय मे समाज को केवल काम के आधार पर बाटा गया था यानी जो पढाई और पूजा करता था उसे ब्राह्मण कहा जाता था जो युद्ध और साशन करता था उस क्षत्रिय कहा जाता था जो व्यापार करता था उसे वैश्य कहा जाता था और जो सेवा या मेहनत का काम करता था उसे शूद्र कहा जाता था उस समय यह विभाजन स्थाई नही था. अगर कोई व्यक्ति मेहनत करता और ज्ञान प्राप्त करता तो वह अपना काम बदल भी सकता था लेकिन धीरे धीरे समाज मे यह व्यवस्था कठोर होती गई और काम के आधार पर बनी यह पहचान जन्म के आधार पर तय होने लगी. यही वह समय था जब जाती व्यवस्था धीरे-धीरे  मजबूत होने लगी. भारत मे जाती व्यवस्था का सबसे पुराना उल्लेख प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद मे मिलता है ऋग्वेद को दुनिया के सबसे पुराने धार्मिक ग्रंथो मे से एक माना जाता है और इसे लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास लिखा गया माना जाता है ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध भाग को पुरुस सूक्त कहा जाता है इस सूक्त मे बताया गया है की एक ब्राह्मणडिये पुरुष के शरीर से पूरे समाज की रचना हुई. इस कहानी के अनुसार उस पुरुष के मुख से ब्राह्मण , भुजाओं से क्षत्रिय, जांघो से वैश्य और पैरो से शूद्र पैदा हुए. इस कथा का उद्देश्य यह समझाना था की समाज के अलग-अलग  वर्गो की अलग-अलग जिम्मेदारी होती है लेकिन कई इतिहास कार मानते है की यह कथा समाज को व्यवस्थित करने का एक धार्मिक तरीका था उस समय समाज मे यह बिभाजन उतना कठोर नही था जितना बाद मे हो गया. कई विद्वानों का मानना है की प्रारंभिक वैदिक समाज मे लोग अपनी योग्यता और काम के अनुसार जीवन जीते थे यानी एक परिवार का व्यक्ति अगर पढाई करता तो वह ब्राह्मण बन सकता था और अगर कोई युद्ध मे कुशल होता तो वह क्षत्रिय बन सकता था इससे यह समझ आता है की सुरुआत मे समाज मे थोड़ी लचीलापन था और जाती जन्म से तय नही होती थी यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है की वर्ण और जाती दोनों अलग चीजे है बहुत लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते है लेकिन इतिहास मे इनका मतलब अलग है वर्ण केवल चार बड़े सामाजिक वर्ग थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. यह एक तरह से समाज को समझाने का एक सिद्धांत था लेकिन जाती उससे अलग चीज है जाती वस्ताव मे उन हजारो छोटे छोटे समूहों को कहा जाता है जो समाज मे मौजूद है भारत मे आज भी हजारो जातियाँ और उनकी उपजातिया है जैसे एक ही क्षेत्र मे कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाइ, धोबी, यादव, कुर्मी जैसे अलग अलग जातियाँ होती है यह जातियाँ अक्सर किसी खास काम या पेशे से जुड़ी होती थी समय के साथ ये पेशे परिवारों मे स्थाई हो गए और एक पीढी से दूसरी पीढी मे जाने लगे. इसी वजह से समाज ने इन पेशों को ही जाती का रूप दे दिया. यही कारण है की भारत मे जाती व्यवस्था धीरे- धीरे बहुत जटिल बनती चली गई और हजारो अलग अलग सामाजिक पहचान बन गई.

 

 

 

प्राचीन भारत मे समाज का ढांचा मुख्य रूप से काम के आधार पर बना हुआ था उस समय अलग- अलग समुदाय अलग- अलग पेशे करते थे जैसे किसान खेती करते थे लोहार लोहे का काम करते थे कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते थे और व्यापारी व्यापार करते थे सुरुआत मे यह पेशा बदलना संभव था लेकिन धीरे-धीरे समाज मे यह परंपरा बन गई की पिता का काम बेटा ही करेगा.

 

जब यह परंपरा कई पीढ़ियों तक चलती रही, तो समाज ने इन पेशों को स्थाई पहचान दे दी. उदाहरण के लिए अगर कोई परिवारों कई पीढ़ियों आ लोहार का काम कर रहा था तो समाज उसे लोहार जाती कहने लगा. इसी तरह जो परिवार खेती करते थे उन्हे किसान या किसी खास जाती से जोड़ा जाने लगा. इस तरह धीरे- धीरे पेशा ही जाती बन गई. समाज मे शादी विवाह भी उसी जाती के अंदर होने लगे. इससे जाती व्यवस्था और मजबूत होती गई. समय साथ कुछ धार्मिक ग्रंथ लिखे गए जिनमे समाज की व्यवस्था को नियमो मे बांधने की कोशिश की गई. इन ग्रंथो मे सबसे ज्यादा चर्चा मनुस्मृति की होती है

 

मनुस्मृति मे समाज के अलग अलग वर्गो के लिए अलग अलग नियम बताये गए थे इसमे बताया गए की कौन किस प्रकार का काम करेगा, किससे विवाह करेगा और किसके साथ भोजन करेगा. इन नियमो ने समाज को और कठोर बना दिया. धीरे धीरे यह विचार फैल गया की व्यक्ति की जाती उसके जन्म से तय होती है अगर कोई व्यक्ति किसी खास जाती मे पैदा हुआ है तो उसे उसी जाती का काम करना होगा. यही वह समय था जब जाती व्यवस्था जन्म के आधार पर स्थाई होने लगी. कई समाजशास्त्री मानते है की यही वह मोड़ था जहा से जाती व्यवस्था ने एक कठोर रूप लेना शुरू किया. मध्य काल के समय मे भारत मे जातियों की संख्या बढ़ने लगी इसका कारण यह था की उस समय अलग अलग राज्यो का विस्तार हो रहा था और नये नये पेशे भी पैदा हो रहे थे जब कोई नया पेशा शुरू होता तो उससे जुड़ा नया समुदाय बन जाता और धीरे धीरे वह एक नई जाती बन जाती. उदाहरण के लिए कुछ लोग सैनिक बन गए, और कुछ लोग व्यापारी बन गए और कुछ लोग कारीगर बन गए. इन सभी पेशों के आधार पर अलग अलग सामाजिक पहचान बनने लगी. कई जगहो पर समाज के कुछ जातियों को ऊचा और कुछ को नीचा मानना शुरू कर दिया. इसी समय जाती व्यवस्था और जटिल होती चली गई और हजारो जातियाँ बन गई.

 

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