Written by: Sumant yadav सम्राट चौधरी गृह राज्य मंत्री, बिहार
लालू यादव के दौर वाले जंगल राज को खत्म करने के लिए सता मे आये नितीश कुमार 2005 से अब तक गृह मंत्री रहे। करीब 20 साल के कार्य काल मे उन्होंने सुशासन बाबू होने का तमगा पाया है। अब बिहार के गृह मंत्रालय का प्रभार उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सौपा जा रहा है उनके लिए बहुत चुनौती पूर्ण होगा इस जिम्मेदारी को संभालना।

नितीश कुमार ने 2005 के बाद जिस तरह से अपराध पर नकेल कसी फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये पुलिस को खुली छुट दिया और गृह मंत्रालय को खुद संभाल कर हर बड़े केस मे सीधे दखल दिया। उसने लोगो के मन मे यह भरोसा बैठा दिया की अगर कोई नेता कानून व्यवस्था संभाल सकता है तो वह नितीश कुमार है उनका सबसे बड़ा हथियार था भयमुक्त प्रशासन। चाहे कोई अपराधी कितना भी बड़ा हो, राजनीतिक रूप से जुड़ा हो या दबदबा रखता हो नितीश के दौर मे पुलिस करवाई पर किसी तरह का पर्दा नही डाला जाता था
सम्राट चौधरी के राजनीतिक व्यक्तित्व आक्रामक है उनका स्टाइल सीधा सपाट और दो टूक माना जाता है गृह मंत्रालय संभालते हुए उन्हे एक संतुलन कायम करना होगा। जिसमे ला एंड ऑर्डर को कायम रखते हुए लोगो का भरोसा अर्जित करना शामिल है क्योंकि जब भी बिहार मे कोई बड़ा अपराध होगा जनता का पहला सवाल होगा की अगर नितीश होते तो यह तुलना सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। क्योंकि बिहार मे कानून व्यवस्था का मुद्दा सिर्फ आकड़ो की बात नही बल्कि भावनात्मक भी है
नितीश कुमार ने अफसरशाही को हमेशा यह संदेश दिया की टॉप बॉस खुद कानून व्यवस्था के काम पर नजर रख रहा है पुलिस महकमे मे भी उनका एक अलग दबदबा था अब वही अफसर शाही अचानक नये बॉस के अधीन है सम्राट के लिए चुनौती यह होगी की वे पुलिस को राजनीतिक दबाव से बचा पाए। बड़े मामलों मे त्वरित और पारदर्शी करवाई तय कर सके। थानो तक संदेश पहुँचा पाये की अपराध पर जीरों टॉलरेंस पहले की तरह जारी रहेगा।
सम्राट चौधरी न सिर्फ गृह मंत्री है बल्कि बीजेपी के बड़े चेहरे भी है भाजपा नेतृत्व ने उन्हे बिहार चुनाव मे बंपर जीत के जिस तरह प्रोमोट किया है वह पार्टी के कई रण नितिक फैसलो का परिणाम है सम्राट चौधरी जिस कुशवाहा जाती से आते है उसकी एक बड़ी आबादी यूपी मे भी रहती है ऐसे मे सम्राट चौधरी यदि गृह मंत्री के रूप मे प्रभाव छोड़ते है तो यह दिगर राज्यो मे पार्टी के प्रचार मे काम आयेगा। ऐसे मे सम्राट चौधरी को सुशासन बाबू वाले ब्रांड का सच्चा हकदार बनना होगा।
नितीश कुमार के समय मे यह फायदा था की वे खुद सत्ता के केंद्र थे पर सम्राट को गृह मंत्री की भूमिका के साथ साथ एनडीए के भीतर रिश्तों का संतुलन भी साधना होगा। खासकर बीजेपी, जेडीयू, और अन्य छोटे दलों के बीच कानून व्यवस्था के मामले कभी भी राजनीतिक घमा सान का कारण बन सकते है सम्राट का हर कदम राजनीतिक नजरिये से भी तौला जायेगा।
जब नितीश कुमार ने जंगल राज के खिलाफ लडाई शुरू किया तब सोशल मीडिया का दबाव नही था 2005 के दौर का मीडिया भी अलग था उन्हे अपनी पकड़ कायम करने के लिए पूरी मोहलत मिली। आज हर घटना हर लाठीचार्ज हर अपराध, हर गिरफ्तारी तुरंत वायरल हो जाती है
सम्राट चौधरी की छवि आक्रामक नेता की रही है ऐसे मे उनके किसी भी ब्यान या करवाई को तुरंत राजनीतिक हथियार बनाया जा सकता है कई बार झूठा नेरेटिव भी चलाया जायेगा। क्यों की निशाना सम्राट चौधरी से ज्यादा बीजेपी पर होगा। नितीश ने यह दौर कम झेला। सम्राट को हर दिन इससे लड़ना होगा।
सबसे कठिन काम यही होगा। अगर सम्राट नितीश के मॉडल पर चलते है तो लोग कहेंगे सुशासन तो नितीश का ही है सम्राट बस चला रहे है और अगर वे कोई नया मॉडल लाने की कोशिश करते है और उसमे कमी कमी दिखाई देती है तो कहा जायेगा की नितीश के समय ऐसा नही होता था यानी सम्राट के लिए यह दोधारी तलवार है उन्हे यह साबित करना होगा की वे सिर्फ नितीश की जगह भरने नही आये है बल्कि अपने दम पर कानून व्यवस्था का नया मानक स्थापित कर सकते है
बिहार कई बार छोटे छोटे मसलो पर भी सांप्रदायिक या जातिगत तनाव झेलता है नितीश ने काफी हद तक नियंत्रित रखा । अब सम्राट के लिए चुनौती यह होगी की उनके कार्य काल मे दंगे न हो। जातीय हिंसा नियंत्रण मे रहे। छोटे छोटे तनाव राजनीतिक मुद्दा न बने। पुलिस निष्पक्ष दिखे। क्यों की एक भी बड़ा फ्लैश पॉइंट उनकी छवि पर सवाल खड़ा कर सकता है ।
संबंधित खबरे:
